Wednesday, July 21, 2010

बनना एक मेंढक का नेता


प्रकृति की एक बिरली रचना है मेंढक। ऐसा जीव जिसे शायद ही कोई अनोखा व्यक्ति होगा जो इसे अथवा इसके व्यक्तित्व के बारे में न जानता हो। जंतु विज्ञान में इस अभूतपूर्व हस्ती की विभिन्न प्रजातियां बताई गई हैं। किंतु जहां तक मेरी बात है, तो मैं सिर्फ दो तरह के मेंढकों को ही जानता हूं, बरसाती और चुनावी मेंढक (नेता)।
एक रात मैं घर में बैठा कुछ लिखने की कोशिश कर रहा था। अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई। मैंने दरवाजा खोला पर बाहर कोई नजर न आया। चारों तरफ नजरें दौड़ाना भी व्यर्थ रहा। हवा तेज थी सो दस्तक को भ्रम मान कर मैंने दरवाजा बंद करना चाहा। तभी एक भर्राई सी आवाज सुनाई दी- 'महोदय, ऊपर नहीं नीचे देखिए। मैं यहां हूं, आपके पैरों के पास।'
नीचे एक लहू-लुहान मेंढक बैठा मेरी तरफ उम्मीद भरी निगाहों से देख रहा था। हाल-बेहाल देखकर मैंने उसे हाथों में उठा लिया और दरवाजा बंद कर लिया। फटाफट एक कटोरी में पानी गर्म किया और रुई का फाहा लेकर जैसे ही उसके जख्मों को साफ करने लगा, उसकी चीख निकल गई। काफी दर्द था उसकी चीख में।
चेहरे पर राहत के भाव नजर आने पर उसकी इस बिगड़ी दशा का कारण पूछा। पहले तो वह चुप रहा लेकिन जब उसे लगा कि वह सुरक्षित हाथों में है तो बेहद दबी आवाज में बोला- 'हमारे क्षेत्र का एक सफेदपोश गुंडा चुनाव लड़ रहा है। उसका चुनाव चिह्न है मेंढक।' मैंने कहा- 'यह तो खुशी की बात है। चुनाव चिह्न के स्थान पर अब तुम्हारी तस्वीर छपेगी। इससे मेंढकों का सम्मान और बढ़ेगा।'
मेरा कहा उसे रास नहीं आया। मेरी बात काटते हुए बोला- 'नहीं श्रीमान्, यह खुशी की बात नहीं बल्कि मुसीबत का सबब है। पूछने पर उसने बताया सफेदपोश गुंडे के चुनाव चिह्न वाले मेंढक की शक्ल मुझसे मिलती है।'
मैंने पूछा- 'तो इसमें मुसीबत वाली क्या बात है।' उसका कहना था कि- 'आप तो जानते ही हैं कि मेंढक जाकि किसी को भी शोहरत, उपलब्धि मिलने पर उसकी टांग खींचने लगती है। मेरी बिरादरी के सारे मेंढक मेरी टांग खींच रहे हैं। उन्हें लगता है चुनाव चिह्न वाला मेंढक मैं ही हूं। बहुत समझाया लेकिन कोई मानने को तैयार नहीं है। जैसे-तैसे बचकर आपकी शरण में मदद के लिए आया हूं। खैर, मेरी छोड़िए और अपनी बताइए। इतनी रात क्यों जाग रहे हैं।'
मैंने अपने जागने का कारण बताया- मैं लेखक हूं। बरसाती मेंढक और चुनावी मेंढक (नेता) में तुलना वाला लेख लिख रहा हूं...।
मेरी बात पूरी भी नहीं हो पाई थी कि वह जोर से चिल्लाया, मानों किसी ने उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया हो। बोला- 'मैं तो आपको इनसान समझ बैठा था। आप तो निहायत ही घटिया, क्रूर और मतलबी हैं। आप हम बेगुनाह मेंढकों की तुलना चुनावी मेंढकों से कर रहे हैं। आप नहीं जानते कि मेंढक भले ही दूसरे मेंढक की उपलब्धि पर उसकी टांग खींचें पर एक-दूसरे पर कीचड़ नहीं उछालता। वह स्वर्थ के लिए अपना ईमान भी गिरवी नहीं रखता। न ही भाई -भाई को लड़वाता ही है। वह धर्म-संप्रदाय के नाम पर दंगे-फसाद भी नहीं करवाता।
मेंढक तो हर साल बारिश में व कभी-कभी शुष्क मौसम में भी नजर आ जाते हैं लेकिन नेता चुनाव से पहले नजर नहीं आते। इनके दर्शन पांच साल में एक बार ही होते हैं। ढेरों झूठे वादे करते हैं। जैसे गिरगिट रंग बदलता है उसी तरह ये दल बदलते हैं। अब आप ही बताएं चुनावी मेंढक से बरसाती मेंढक की तुलना करना उचित है? नहीं श्रीमान्, कदापि नहीं। आप हम मेंढकों पर इतनी बड़ी तोहमत मत लगाइए। क्यों हमें आत्महत्या करने पर मजबूर कर रहे हैं। हम पहले से ही परेशान हैं अपनी मेंढक प्रजाति को बचाने की चिंता से।' इतना कह कर वह रुक गया।
लगा उसकी बात पूरी हो गई। मैं कुछ कहता उससे पहले ही वह गहरी सांस लेकर बोला- 'जिसे देखो हमारे कंधे पर बंदूक रखकर निशाना लगाना चाहता है। लेखक हमारे व्यक्तित्व पर लिखकर रातों-रात ख्यात होना चाहते हैं। छात्र डॉक्टर बनने के लिए प्रयोगशाला में हमारे खंड-खंड कर देते हैं। हम यह सोचकर प्रतिकार नहीं करते कि चलो हमारा मरना किसी के तो काम आ रहा है। पर मरने के बाद हम मेंढकों की आत्मा भटकती है, क्योंकि मरने के बाद कोई डॉक्टर, मास्टर, नेता-अभिनेता मेंढकों को झूठी श्रद्धांजलि देना भी उचित नहीं समझता।'
वह बोला- 'आपको लिखना ही है तो मेंढकों को बचाने के लिए लिखिए। हमारी प्रजाति आपको दुआएं देगी।' इतना कहकर वह ऐसे चुप हो गया मानों किसी ने उसकी आवाज ही छीन ली हो।
मैं उसकी दलील सुनकर हतप्रभ था। सच, कितना दम था उसकी बेबाक बयानी में। अब मेरी कलम आगे बढ़ने को तैयार नहीं थी। मैंने मेंढक से चुनावी मेंढक की तुलना करने का विचार त्यागकर मेंढकराज को विदा किया और सो गया।
अगली सुबह दरवाजे पर फर वही जानी-पहचानी सी दस्तक सुनाई दी। दरवाजा खोला तो आश्चर्य का ठिकाना ही नहीं रहा। वजह यह कि चंद घंटे पहले जो मेंढक नेताओं को कोस रहा था वही सफेद कुर्ता और खादी टोपी लगाए मेरे सामने हाथ जेड़े कुटिल मुस्कान लिए खड़ा था।
मुझे बोलने का मौका दिए बिना ही वह बोला- 'श्रीमान आप नाहक परेशान न हों। मैं अब नेता बन गया हूं अपने इलाके से इलेक्शन लड़ रहा हूं। कल रात मैं आपसे मदद मांगने आया था, अब वोट मांग रहा हूं। मुझे यकीन हैं आप मुझे ही वोट देंगे।'
मैं हैरान सा उसे देखे जा रहा था। दिमाग में उठ रहे सवालों को उसने मेरा चेहरा देखकर ही पढ़ लिया। बोला- 'रात घर पहुंचने पर पता चला कि चुनाव लड़ने वाले सफेदपोश गुंडे ने जो पोस्टर छपवाए थे उसमें त्रुटिवश चुनाव चिह्न की जगह प्रत्याशी (गुंडे) का और प्रत्याशी की जगह चुनाव चिह्न (मेंढक) का फोटो छप गया है। मैंने सोचा क्यों न इस त्रुटि का फायदा उठाया जाए। इसलिए मैंने उस सफेदपोश से सारे पोस्टर रद्दी के भाव खरीद लिए ताकि मैं अपने चुनाव प्रचार में उनका उपयोग कर सकूं। मैंने चुनाव आयोग से चुनाव चिह्न के रूप में उसी सफोदपोश की तस्वीर चाही है।'
एक परिपक्व नेता की तरह वह बोले जा रहा था। उसने कहा- 'मेरे चुनाव लड़ने की घोषणा से पूरी मेंढक प्रजाति खुश है। मुझे पूरा यकीन है कि चुनाव मैं ही जीतूंगा और सांसद बनूंगा। आपको अपना पी.ए. बनाऊंगा। इसलिए आप मुझे वोट देना न भूलें। इतना कहकर वह वह अगले घर की ओर चल दिया।'
ठीक दो दिन बाद मतदान हुआ। वह मेंढक जीत कर सांसद बन गया लेकिन मुझे उसका वादा पूरा होने का इंतजार आज भी है। यह जानते हुए कि उसका किया वादा कभी पूरा नहीं होगा, क्योंकि वह अब सिर्फ एक मेंढक ही नहीं रहा बल्कि परिपक्व नेता जो बन चुका है।